Poetry

तुम्हारी याद

आज फिर तुम याद आने लगे होऐसा नहीं है की मैं तुम्हें भूल गया हूँपर शायद याद आने और नहीं भूलने में फ़र्क़ होता है याद आना एक सक्रिय प्रक्रिया हैनहीं भूलना किसी को ख़ुद में समाहित कर लेने जैसा होता हैजैसे सांस लेना एक निष्क्रिय प्रक्रिया हैपर साँसो को महसूस करते हुए साँस लेना […]

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धूप और तुम

“धूप अच्छी लगने लगी है” मैंने कहाउसने कहा – मौसम बदल गया है , सर्दिया आ गई हैं।तो क्या धूप या हमारा कुछ किरदार नहीं है ?फिर फूल क्यों अच्छे लगते हैं ?तुम क्यों इतनी अच्छी लगती हो?उसने कहा- सब परिस्थितियों का खेल है।अरे! तो क्या कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं होता?क्या फूल और

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द्वन्दों के पार

क्यों अधरों पर मुस्कान लिएनैनो से नीर बहाते हो ?कुछ पाकर खो दिया हैया कुछ ना पाने पर रोते हो? क्या कुछ सपने टूट गएया फिर अपने रूठ गए ?उम्मीदों का बाँध टूट गयाया कोई सहाय्य छूट गया ? यह जीवन एकल खेल हैमिले ना संगी साथतुम्ही आत्मीय तुम्ही अरातितुम्ही उषा हो तुम्ही हो रात

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खोई हुई आंखें

बंद आंखों से देखता है जब सपना और अचानक जगा दे कोई झुंझला सा जाता है जैसे झुंझला जाता है बच्चा जब छीन लिए जाते हैं उसके खिलौने खुली आंखों से देखता है जब ख़्वाबऔर सजग कर दे अनायास कोई सिमट सा जाता है जैसे सिमट जाता है विहग शाम को अपने घोंसले में दिनभर

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