धूप और तुम

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“धूप अच्छी लगने लगी है” मैंने कहा
उसने कहा – मौसम बदल गया है , सर्दिया आ गई हैं।
तो क्या धूप या हमारा कुछ किरदार नहीं है ?
फिर फूल क्यों अच्छे लगते हैं ?
तुम क्यों इतनी अच्छी लगती हो?
उसने कहा- सब परिस्थितियों का खेल है।
अरे! तो क्या कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं होता?
क्या फूल और काँटे दोनों समान हैं?
प्रकृति के लिए सब समान हैं- उसने कहा।
शिकार और शिकारी भी?
शिकारी भी किसी का शिकार है ।
तो फिर कोई सुखी कोई दुखी क्यों है?
क्यूंकि लोग भेद करते हैं ।
भेद करने की क्षमता ही तो ज्ञान है!?
भेद के साथ सबकुछ स्वीकार करना ज्ञान है ।
तो तुम मुझे अच्छी लगती हो इसलिए स्वीकार हो
या स्वीकार हो इसलिए अच्छी लगती हो ?
मैं उसी धूप की तरह हूँ, आज अनुकूल तो स्वीकार
कल प्रतिकूल तो दुत्कार।

कुछ बदल सा गया उस दिन
अब मैं सिर्फ़ उसे नहीं , उसका वक्त भी चाहता हूँ
अब सिर्फ़ वह नहीं , उसके साथ बिताए पल भी अच्छे लगते हैं ।

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