
कहते हैं जब चाँद मिल जाता है तो उसके दाग़ दिखने लगते हैं। आज हमने चाँद की विस्तृत तस्वीरे देखली हैं तो क्या चाँद अब बचपन जैसा आकर्षक नहीं लगता ..? चाँद आज भी वैसा ही शीतल, मनोरम और चित्ताकर्षक है। विज्ञान ने हमें बता दिया है कि चाँद के पास ख़ुद का कोई प्रकाश नहीं है और उसकी सतह पृथ्वी जैसी ही उभर-खाभर है। अभी तक की जानकारी के अनुसार चाँद एक जड़ ठोस चटान-सा एक पिंड है। उसमे ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे देख कर उसके ऊपर कोई नग़मा या ग़ज़ल लिखी जाय। फिर ये शायर, ये कवि लोग क्यों पागल बने फिर रहे हैं..? क्या ये इन वैज्ञानिक खोजों से अनभिज्ञ हैं या विज्ञान को नहीं मानते ?
आप इस विषय के थोड़े तह में जाएँगे तो आपको पता चलेगा कि ये रचनाकार पागल नहीं हैं। ये स्वस्थ इंसान हैं और शायद मेरे और आपसे ज़्यादा ज़िंदा हैं। इनकी रचनाये इनके ज़िंदा होने की साक्ष्य हैं। इनकी जड़ता में चेतना देखने की कला ही हमें दुनिया की ख़ूबसूरती का एहसास कराती है।
इस तथ्य को दूसरे तरीक़े से समझने की कोशिश करते हैं। आज चिकित्सा विज्ञान में हमारे शरीर की कोसिका स्तर तक की तस्वीर निकाल रखी है। आप मानव शरीर का विश्लेषण करेंगे तो पायेंगे यह शरीर रक्त , वसा, मांस और हड्डियों का एक समवाय है जो नित्य मल-मूत्र बनाते और निष्काशित करते रहता है।यह बात आप भी भली भाँति जानते हैं।
प्रश्न यह है कि ये सब जानते हुए भी हम क्यों इस शरीर के पिछे भागते रहते हैं ? चिकित्सक और अन्य लोग जिनका जीवनचर्या इस शरीर की अवयवों के साथ चीर-फाड़ में गुजरता है , जो इसकी अधमता को दिन-रात अनुभव करते हैं, वे लोग भी इसकी मोह से मुक्त नहीं होते।
कहने का तात्पर्य यह है कि हम सब बुद्धि और समझ से कम, भावनाओं से ज़्यादा जीते हैं। मनुष्य एक तार्किक नहीं बल्कि भावना प्रधान प्राणी है। और यह भावना ही इस दुनिया को ख़ूबसूरत बनाती है। वरना आप पहाड़ देखो, उनमें देखने जैसा क्या है..! चट्टानों की ढेर मात्र हैं। ये फूल, नदियाँ, झरने, समुद्र-तट इत्यादि में क्या रखा है जिसे देखा जाए..?
फिर, आप थोड़े गहराई में उतरकर जानने की कोशिश करेंगे तो पाएंगे इन सब में हम केवल अपनी ख़ूबसूरती देखते हैं। अपने चित्त की दशा देखते हैं। इन बाह्य चीज़ों का अपना कोई मतलब नहीं है। हमारी मनोदशा के अनुसार हम इन्हें अर्थ देते हैं। जब हमें अपना जीवन भद्दा और उबाऊ मालूम होता है तो हम अपने सुंदर और आकर्षक पहलुओं को देखने के लिए इन प्राकृतिक सर्जनाओं का सहारा लेते हैं।
अब आते हैं जहाँ से हमने यह चर्चा शुरू की थी। जब हमें कोई इंसान पसंद आता है और हम उसे बस दूर से देख पाते हैं तो वह इतना ख़ूबसूरत और चित्ताकर्षक लगता है कि मानो कोई दिव्य विभूति हो। हम अपनी कल्पनाओं में उसकी ऐसी तस्वीर बना लेते हैं कि बस ये मिल जाय फिर जीवन में कोई कमी नहीं रहेगी। फिर एक दिन उसका साथ मिल जाता है। हमें कुछ दिनों तक विश्वास नहीं होता कि यह व्यक्ति सच में हमारे साथ है। विश्वास हो भी कैसे ..! ऐसी दिव्य कृतियाँ मिलती कहाँ हैं..!
फिर हम धीरे-धीरे धरातल पर आने लगते हैं। हमें वास्तविकता का एहसास होने लगता है। फिर हम पाते हैं इस व्यक्ति में तो ऐसा कुछ भी ख़ास नहीं है जैसा कि हम पहले सोचा करते थे। इसमें उस व्यक्ति की प्राप्ति और हमारा उसके यथार्थ को जानना दोनों कारण हैं। जब तक अप्राप्त था तब तक हम अपनी कल्पना अनुरूप उसके गण-गुण तय करते रहे। अब जब वह वास्तविकता से नहीं मेल खाता तो हमारा मोह भंग होने लगता है। यहीं से रिश्तों में दरार आनी शुरू हो जाती है। अब वही व्यक्ति हमें चुभने लगता है। जो आवाज़ कल तक मीठी लगती थी अब वही कर्कशा मालूम पड़ती है। वस्तुतः कुछ बदला नहीं है सिवाय हमारे सोच के। चूँकि व्यक्ति हमें प्राप्त है इसलिए हमें उसकी खामिया ज़्यादा और गुण कम दिखते है। अब हम उसी व्यक्ति से दूर भागना चाहते हैं कभी जिसके पिछे भागते थे। बात खत्म हो जाती अगर सच में हमारा मोह भंग हो जाता। पर ऐसा होता नहीं है। हम फिर से नयी खोज में लग जाते हैं, नए चाँद की। बिन दाग का चाँद।
कोई चाँद बिना दाग के नहीं होता। बस हमारी भ्रांति उसे बेदाग बनाती है।
इस पूरे परिचर्चा को आज के सतत बदलते रिश्तों के संदर्भ में देखा जाय तो हमें एहसास होगा की डांवाडोल संबंधों का मुख्य कारण हमारी ये बेदाग चाँद की खोज है। एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स इसी खोज का परिणाम है। और हमारी यह खोज निरंतर चलती रहेगी जब तक हम यथार्थ को स्वीकार न कर लें। जब तक चाँद को उसके दाग के साथ अंगीकार नहीं कर लेते।
