
मुनीर नियाज़ी की ‘हमेशा देर कर देता हूँ ‘ अक्सर मुझे मेरी अपनी बात लगती है। जब तक किसी से थोड़ी-बहुत आत्मीयता होती है, बिछड़ने का समय आ जाता है। कोई जगह पसंद आए कि लौटने की वेला हो आती है। इस उक्ति को हम ऐसे भी देख सकते हैं कि जब कुछ छूटने को होता है तो हमें उसकी अहमियत समझ आती है, अन्यथा देर करने का क्या कारण हो सकता है..!
यह बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है। जीवन की गोधूली में हमें जीवन के मर्म और मक़सद का भान होने लगता है। फिर बहुत कुछ सुधारना चाहता है इंसान, परंतु शारीरिक अशक्तता और काल के निरंतर बढ़ते पदचाप उसे बेचैन और पछताने के सिवा कुछ करने नहीं देते।
इसके विपरीत युवा अवस्था में बहुत समय और ऊर्जा होने की भ्रांति हमें वर्तमान से खींच भूत की घटनाओं और भविष्य की चिंताओं में उलझाए रखती है। जीवन कैसे दूसरो से उलझते -झगड़ते कट जाता है, अंदाज़ भी नहीं होता है।
अहंकार का शारीरिक ऊर्जा से कोई खासा संबंध लगता है। जब तक जवान हैं, मजाल की किसी को थोड़ा ठहर के सुन लें ! और जब शरीर कमज़ोर पड़ने लगता है तो हमें कोई ऐसा चाहिए होता है जो हमें सुने । आपने देखा होगा की बुजुर्गों के पास बातें बहुत होती हैं और अधिकांशतः शिकायते। और ग़ज़ब तो ये है कि यही शिकायते इनके बुजुर्गों को भी थी जिन्हें अपने दिनों में ये अनसुना करते आए थे। अब इन्हें नई पीढ़ी बिगड़ैल मालूम होती है बिल्कुल वैसे ही जैसे इनके पिछली पीढ़ी को उनकी संतति रद्दी लगती थी। बाप को बेटा समझे तब-तक उसे नहीं समझने वाला ख़ुद का बेटा हो जाता है और यह चक्र निरंतर चलता रहता है।
अभिप्राय यह है कि सब देर करते आ रहे हैं। और यह देर करने का ही नतीजा है कि हमारी शिकायते ख़त्म नहीं होती। अंतर-पीढ़ीगत दरार वस्तुतः देर से समझने के कारण है अन्यथा विचारों में भेद कहा नहीं है ! एक पीढ़ी के भीतर भी बहुत फ़ासले हैं पर हम उन्हें वैचारिक मतभेद समझ के अनदेखा करते हैं।
हमारे जीवन में जितने पछतावा हैं उनके मूल में समय पर हमारा सचेत नहीं होना है। और मानवीय मूल्यों में चेतना से बढ़ के कोई मूल्य नहीं है। ये चेतना ही हमें बाक़ी जानवरों से अलग करती है। इस चेतना के मार्जन से ही बुद्ध बनते हैं और पतन से निकृष्ट पशु।
इस चर्चा को अगर हम निष्कर्ष की ओर ले जाना चाहें तो दो शब्द निकल कर आते हैं – चेतना और समझ। समझ वस्तुतः चेतना से ही उत्पन्न होती है अतः एक शब्द बचा -चेतना।
जितने भी सजीव हैं सब चेतना के अलग-अलग स्तर पर स्थित हैं। जैन दर्शन के अनुसार निर्जीव में भी चेतना है पर वह व्यक्त नहीं है। मानव इस चेतना की सीढ़ी पर बाक़ी जानवरो से ऊपर है और बुद्ध-कृष्ण इसके शिखर हैं। अगर हमें अपने जीवन की शिकायतों और अक्सर देर कर देने की समस्या के परे जाना है तो उसका एक ही रास्ता है- चेतना की परिष्करण। मेरी समझ से धर्म बस यही है।
अब आप को लग सकता है कि बात कहाँ से शुरू हुई थी और कहाँ आ गई। अगर ऐसा है तो शायद आप फिर देर कर रहे हैं। आप फिर तत्व की जगह तथ्य में उलझ रहे हैं। और चलते आ रहे कुचक्र को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दे रहे हैं।
