खोई हुई आंखें

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बंद आंखों से देखता है जब सपना
और अचानक जगा दे कोई

झुंझला सा जाता है
जैसे झुंझला जाता है बच्चा
जब छीन लिए जाते हैं उसके खिलौने

खुली आंखों से देखता है जब ख़्वाब
और सजग कर दे अनायास कोई

सिमट सा जाता है
जैसे सिमट जाता है विहग
शाम को अपने घोंसले में दिनभर नभ चरने के बाद

चार आंखों से ख़्वाब संजोता है जब
और वियोग हो जाए आंखों का यकायक

झुंझलाता नहीं है वो तब

शांत हो जाता है
जैसे शांत हो जाता है घर बेटी के विदाई के बाद

समेट नहीं पाता है खुद को

बिखर जाता है
जैसे बिखर जाता है मकान खंभे टूट जाने पर

ऐसे आंख नहीं करते अब कल्पना
नहीं करते भविष्य सेंधने की धृष्टता

हो जाते हैं वर्तमान से भी अनभिज्ञ
जैसे उन्माद में होते हैं लोग भांग के बाद

खो जाते हैं अतीत के गलियारों में
जैसे खो जाता है बचपन जीवन के असालत में।

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