
कहते हैं इंसान ने जितनी रचनाएँ की हैं अकेले में की है। भीड़ में सृजनतमा क्षमता नहीं होती। भीड़ आपको एक राह दिखा कर आपको सोचने से रोकती है। फिर आप सोचने की जरूरत नहीं समझते और शायद आपकी सोचने की शक्ति भी धीरे धीरे क्षीण होने लगती है। पर ये अकेलापन, जहाँ इंसान कुछ सृजन करता है उसे पल-पल गलाते जाता है। वह जो कुछ रचता है उसमें उसका कुछ बहुत ही निजी खर्च हो रहा होता है, शायद वह ख़ुद। रचनायें आकार लेती जाती हैं और स्वयं रचनाकार बिखरता जाता है। टूटता जाता है, जैसे किसी पक्के मकान को खड़ा करने में कई छोटे-बड़े ईंट-पत्थर बेकार हो जाते हैं। व्यक्ति अपने में इतना खोया रहने लगता है की संसार की वास्तविकता से अनजान हो जाता है। सामाजिक दृष्टि से निकम्मा सा दिखता है। रस खो देता है जीवन का। लोग नहीं भाते उसे। ख़ुद से ही बातें करता है , लिखता है, मिटाता है फिर लिखने का विचार ही छोड़ देता है। कई बार रचना एक विचार होता है, एक दृष्टिकोण होता है , जीवन को देखने का, दुनिया को समझने का। ये विचार उसे जीवन की भाग-दौड़ को निरर्थक बतातें हैं तो कभी उसे महत्वाकांशी नहीं होने पर कोसते हैं। कभी-कभी यही विचार उसे विचारों से बाहर निकलने को कहते हैं और कभी विचार-शून्य जीवन को जानवर तुल्य बताते हैं। इंसान इसी उहा-पोह में खर्च हो जाता है। कुछ बेहोशी में बहुत कुछ इकट्ठा कर लेते हैं फिर उनकी सार्थकता पर विचार करते हैं, कुछ उपयोगिता पर विचार करते-करते कुछ भी नहीं करते। जैसे मैं ये लिख रहा हूँ, इसकी क्या उपयोगिता है !? अगर ये सार-हीन है तो मैं क्यों लिख रहा हूँ !? चिड़िया क्यों चहचहाती हैं ? फूल क्यों खिलते हैं ? ऐसे देखा जाय तो सबकुछ बेमतलब सा है यहाँ। शायद यही इस जीवन की निरर्थकता है। और इसे जीने योग्य बनाने के लिए हम इसमें कुछ सार ढूँढते हैं और ख़ुद को खपा देते हैं। वस्तुतः हम बिना कुछ किए रह ही नहीं सकते। शायद हम जो कुछ भी करते हैं उनका बीज लिए घूम रहे होते हैं और उन्हें रूपांतरित कर यानी उन्हें किसी उर्वर जमीन पर विरोपित कर ख़ुद को हल्का करते हैं। जैसे यह विचार आप तक पहुँचा कर मैं थोड़ा हल्का महसूस कर रहा हूँ। पर यह भी शायद।
